International Journal of Technology and Emerging Research
DOI: 10.64823/ijter.2607003
पर्यटन इक्कीसवीं सदी में वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण सामाजिक–आर्थिक गतिविधि के रूप में उभर कर सामने आया है। विकासशील देशों में इसे न केवल आय और रोजगार का स्रोत माना जाता है, बल्कि क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने और सांस्कृतिक आदान–प्रदान को प्रोत्साहित करने का माध्यम भी समझा जाता है (Timothy & Boyd, 2015) । भारत जैसे बहुजातीय, बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में पर्यटन का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यहाँ प्रत्येक क्षेत्र अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और प्राकृतिक पहचान रखता है।
झारखंड का छोटानागपुर पठार प्राकृतिक संसाधनों, घने वनों, पठारी भू-आकृति और समृद्ध आदिवासी जीवन-शैली के कारण विशिष्ट स्थान रखता है। यहाँ के जलप्रपात, पहाड़ियाँ, धार्मिक स्थल और आदिवासी लोकपर्व पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। पारसनाथ पहाड़ी जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ है, जबकि नेतरहाट को “छोटानागपुर की रानी” कहा जाता है। बेतला राष्ट्रीय उद्यान और विभिन्न वन क्षेत्र पारिस्थितिक पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
परंतु पर्यटन का अनियंत्रित विस्तार पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ सकता है और स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण सतत पर्यटन की अवधारणा का महत्व बढ़ जाता है, जो यह सुनिश्चित करती है कि पर्यटन विकास वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के संसाधनों से समझौता न करे (UNWTO, 2018) ।
पर्यटन से संबंधित साहित्य यह स्पष्ट करता है कि यदि पर्यटन केवल आर्थिक लाभ पर केंद्रित हो, तो यह सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है। Timothy और Boyd (2015) के अनुसार, विरासत और सांस्कृतिक पर्यटन में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, अन्यथा सांस्कृतिक संसाधन केवल उपभोग की वस्तु बन जाते हैं।
Choe और O’Regan (2020) ने दक्षिण एशिया में धार्मिक पर्यटन का अध्ययन करते हुए बताया कि तीर्थ स्थलों पर बढ़ता पर्यटक दबाव स्थानीय समुदायों के जीवन और पर्यावरण को प्रभावित करता है। Singh (2016) ने झारखंड में पर्यटन की संभावनाओं के साथ-साथ आधारभूत संरचना, प्रशिक्षण और नीति क्रियान्वयन की कमियों को रेखांकित किया है।
Patel और Raj (2020) ने आदिवासी क्षेत्रों में समुदाय-आधारित पर्यटन को स्थानीय सशक्तिकरण का माध्यम बताया है, किंतु उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि यदि स्थानीय समुदाय निर्णय प्रक्रिया में सम्मिलित न हों, तो पर्यटन असमानता को बढ़ा सकता है। Thakur (2021) ने आदिवासी पर्वों के पर्यटन उपयोग में सांस्कृतिक संवेदनशीलता की आवश्यकता पर बल दिया है।
छोटानागपुर पठार भौगोलिक दृष्टि से झारखंड का केंद्रीय भाग है। उत्तरी छोटानागपुर में हजारीबाग, गिरिडीह और रामगढ़ जैसे जिले आते हैं, जबकि दक्षिणी छोटानागपुर में रांची, खूंटी, गुमला और सिमडेगा सम्मिलित हैं। यह क्षेत्र साल वनों, नदियों और पठारी भू-आकृति से समृद्ध है।
यहाँ मुंडा, उरांव, हो, खड़िया और संथाल जैसे आदिवासी समुदाय निवास करते हैं, जिनकी जीवन-शैली प्रकृति पर आधारित है। सरना स्थल, जहाँ सामुदायिक धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, आदिवासी संस्कृति के केंद्र हैं (Singh, 2016) । पर्यटन विकास के संदर्भ में यह क्षेत्र सांस्कृतिक, धार्मिक और पारिस्थितिक पर्यटन का संगम प्रस्तुत करता है।
छोटानागपुर क्षेत्र में सांस्कृतिक पर्यटन का आधार आदिवासी लोकपर्व, लोकनृत्य, संगीत और पारंपरिक हस्तशिल्प हैं। सरहुल, करमा और सोहराय जैसे पर्व सामुदायिक एकता और प्रकृति-पूजा के प्रतीक हैं। इन पर्वों के माध्यम से पर्यटक आदिवासी जीवन-दर्शन से परिचित होते हैं (Thakur, 2021)। हालाँकि, यदि इन पर्वों को केवल पर्यटन आकर्षण के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो उनकी धार्मिक और सामाजिक गरिमा प्रभावित हो सकती है।
नेतरहाट, बेतला राष्ट्रीय उद्यान और जलप्रपात पारिस्थितिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं। ये क्षेत्र जैव-विविधता संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा के अवसर प्रदान करते हैं। परंतु पर्यटकों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि से वन्यजीवों के आवास और पारिस्थितिक संतुलन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है (UNWTO, 2018) ।
पारसनाथ पहाड़ी जैसे तीर्थ स्थल धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र हैं। यहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होता है। परंतु अपशिष्ट प्रबंधन और संसाधनों पर दबाव जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं।
पर्यटन स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार और आय के विविध अवसर प्रदान कर सकता है। होमस्टे, स्थानीय मार्गदर्शक, हस्तशिल्प बिक्री और लोककलाओं का प्रदर्शन आजीविका के महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं (Patel & Raj, 2020) । फिर भी, यदि पर्यटन गतिविधियों पर बाहरी एजेंसियों का नियंत्रण अधिक हो, तो स्थानीय समुदायों को सीमित लाभ ही प्राप्त होता है।
छोटानागपुर क्षेत्र में पर्यटन विकास के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ हैं:
पर्यावरणीय क्षरण, अपशिष्ट प्रबंधन की कमी, सांस्कृतिक व्यवसायीकरण, स्थानीय भागीदारी का अभाव और नीति क्रियान्वयन में कमजोरी (Singh, 2016) ।
सतत पर्यटन का उद्देश्य आर्थिक विकास को सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संरक्षण के साथ जोड़ना है (UNWTO, 2018) । छोटानागपुर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में यह दृष्टिकोण अत्यंत आवश्यक है।
समुदाय-आधारित पर्यटन को नीति स्तर पर प्राथमिकता दी जाए।
स्थानीय युवाओं और महिलाओं को पर्यटन से संबंधित प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।
सांस्कृतिक आयोजनों में स्थानीय समुदायों की निर्णायक भूमिका सुनिश्चित की जाए।
पर्यावरणीय वहन क्षमता के आधार पर पर्यटन गतिविधियों का नियमन किया जाए।
पर्यटन से होने वाली आय का एक भाग स्थानीय विकास और संरक्षण में निवेश किया जाए।
उत्तरी एवं दक्षिणी छोटानागपुर पर्यटन की दृष्टि से अपार संभावनाएँ रखते हैं। यदि पर्यटन विकास सतत और सहभागी दृष्टिकोण पर आधारित हो, तो यह न केवल आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करेगा, बल्कि आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी सहायक होगा। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि संतुलित पर्यटन नीति ही छोटानागपुर क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक और समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
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